आँखों देखी – स्कूल, अभिभावक और वो चार लोग

1667

आँखों देखी

स्कूल, अभिभावक और वो चार लोग

एक ऐसा स्कूल जहां प्रधानाचार्य के लिए अंग्रेजी का वो शब्द इस्तेमाल किया जाता है जो हम पिता के लिए उपयोग करते है. भोपाल के इस स्कूल ने 8 नवंबर 2021 से बच्चों की ऑनलाइन क्लास बंद कर दी, वो भी बिना किसी पूर्व सूचना के.

जबकि सरकारी आदेश स्कूल खोलने का था, ऑनलाइन क्लास बंद करने का नहीं.

फोन पर कक्षा अध्यापक से और स्कूल प्रबंधन से अभिभावकों का कोई संपर्क नहीं हो पा रहा था, क्यों कि जानबूझकर फोन अटेंड नहीं किए जा रहे थे.

उद्देश्य साफ था कि ज्यादा से ज्यादा अभिभावकों को ऑफलाइन क्लास  के लिए विवश किया जा सके क्यों कि लगभग 90% अभिभावक इस निर्णय से खुश नहीं थे.

परेशान अभिभावकों ने आपस में संपर्क करके व्हाट्सएप ग्रुप बनाए और इस विषय पर चर्चा की. कुछ लोगों ने नेतृत्व किया और तय हुआ कि 11 November 2021 की सुबह 10 बजे ज्यादा से ज्यादा अभिभावक स्कूल में एकत्रित होंगे और इस संबंध में प्रिंसिपल को आवेदन देकर  उनसे चर्चा करेंगे.

तय समय पर अभिभावकों की भीड़ स्कूल के प्रमुख द्वार पर इकठ्ठा हो गयी.

प्रबंधन ने जब स्कूल के बाहर अभिभावकों की भीड़ देखी तो स्कूल की तरफ से एक अधिकारी जिन्होंने अपने आप को रिलेशनशिप ऑफिसर बताया, वो आए और उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि “आप सब अपना आवेदन मुझे दे दें मैं प्रिंसिपल तक पहुंचा दूंगा”

जब अभिभावकों ने स्वयं प्रिंसिपल से मिलकर उन्हें आवेदन सौंपने की ज़िद की तो आखिरकार प्रिंसिपल को इस बात के लिए हां करनी पड़ी.

यहां तक सब कुछ ठीक लग रहा था.

लेकिन प्रिंसिपल के सामने आते ही वो चार लोग (महिला और पुरुष) जो नेतृत्व कर रहे थे, उन्हें देखकर ऐसा लगा मानो उनकी आधी शक्ति प्रिंसिपल में चली गई हो. जैसे त्रेता युग में सामने वाले योद्धा की शक्ति वानर राज बाली में चली जाती थी.

इसके बाद नेतृत्व कर रहे उन चार लोगों में अचानक से ये होड़ लग गई कि, कौन सबसे ज्यादा प्रिंसीपल की तारीफ करेगा ?

ये चार लोग प्रिंसिपल की गुड बुक्स में आने के लिए चापलूसी करते दिखे.

एक को प्रिंसिपल साक्षात् ईश्वर का अवतार दिख रहे थे, तो दूसरा बार-बार उनकी आत्मा की आव़ाज को सुन लेने का दावा कर रहा था.

तीसरा ये बता रहा था कि वो कितने दयालु हैं, तो चौथा उनकी हर बात पर तालियाँ बजा रहा था.

लेकिन इन तथाकथित त्रिकालदर्शियो में से किसी को भी स्कूल प्रबंधन का षडयंत्र नजर नहीं आया.

जबकि प्रिंसिपल खुद ये कहते दिखे कि वो अभिभावकों को टेस्ट कर रहे थे, ऑनलाइन क्लास बंद करने की ब्लैकमेलिंग सिर्फ इसलिए की गई ताकि अभिभावक परेशान होकर स्कूल आएं और ऑफलाइन क्लास के लिए हाँ कर दें और ऐसा न होने पर स्कूल प्रबंधन ऑनलाइन क्लास वापस  शुरू करने के बदले टयूशन फीस के अलावा एक्स्ट्रा चार्जेस का भुगतान करने का दबाव बना सकें. Funds का रोना रो सकें.

जब प्रिंसिपल अपने इस एजेंडा काम कर रहे थे ठीक उसी समय कुछ चाटुकार उनकी इस बात पर हां में हां मिला कर उनको सहयोग कर रहे थे. उनलोगो का कहना था कि फीस चाहे जितनी ले लें, लेकिन ऑनलाइन क्लास शुरू कर दें.

ये चार लोग ये कहते भी दिखे कि पूरी फीस के अलावा भी स्कूल को और सहयोग राशि दे देंगे. चलो ये उनके व्यक्तिगत विचार हो सकते थे लेकिन आश्चर्य इस बात का था कि ये चार लोग इस तरह से अपनी बात रख रहे थे मानो स्कूल के 4000 बच्चों के अभिभावकों ने इन्हे अपना प्रवक्ता नियुक्त कर दिया हो.

इन 4000 बच्चों के अभिभावकों में से अधिकतर ऐसे है जिनके लिए ये बीते हुए 18 महीने किसी सजा से कम नहीं रहे.

इस कोरोना काल में जब ज्यादातर लोगों की नौकरियां चली गई, व्यवसाय बंद हो गए, ऐसी स्तिथि में वो लोग अपना पेट काटकर भी न्यायालय द्वारा तय की गई टयूशन फीस स्कूल को दे रहे हैं, ताकि उनके बच्चे का भविष्य खराब न हो.

इसके बाद भी जब कोई अभिभावक अपने बच्चे की फीस नहीं भर पाए तो स्कूल द्वारा उनके बच्चो को ऑनलाइन क्लास से वंचित कर दिया गया.

मजबूर अभिभावक जब बकाया फीस चुकाने के लिए  कुछ समय मांगने इन दयालु प्रिंसिपल के पास गये तो अपना अपमान करवाकर ही वापस लौटे.

हमारे पास कुछ ऐसे सबूत हैं जिनमे यही दयालु प्रिंसिपल मजबूर अभिभावकों का अपमान करते हुए और आत्महत्या के लिए उकसाते हुए दिखाई दे रहे हैं, दयालु और देवतातुल्य प्रिंसिपल अभिभावक से कह रहे है कि फीस नहीं भर सकते तो बच्चे को क्यूँ पढ़ा रहे हो. टी सी लो और घर पर बिठालो.

इसके बाद प्रिंसिपल यहीं नहीं रुके वे बोले “तुम मर जाते तो मैं फीस माफ कर देता, तुम जिंदा हो इसलिए अभी फीस भरो नहीं तो टीसी लेलो.

ये मर जाने वाली संवेदनाहीन बात सिर्फ एक बार ही नहीं बोली गयी.

जिस स्कूल में हम अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा के उद्देश्य से भेजते हैं उस स्कूल के प्रिंसीपल को क्या इस तरह का असभ्य व्यवहार करना चाहिए ?

आज क्या ये तय करना आवश्यक नहीं है, कि ये एक संस्था द्वारा जन कल्याण के लिए चलाया जाने वाला स्कूल है या किसी व्यवसायी द्वारा चलाया जा रहा धंधा.

सच तो ये है कि जन कल्याण का चोला इन संस्थाओं द्वारा तभी ओढ़ा जाता है जब सरकारी लाभ लेना हो, जब किसी को लाभ देने की बात आती है तो ये तथाकथित संस्थाएं एक व्यापार ही साबित होती हैं.

ये स्कूल आज Funds का रोना रो रहे हैं अगर सिर्फ टयूशन फीस की ही बात की जाए तो –

4000 बच्चों की फीस 30000 प्रति छात्र (कम से कम) के हिसाब से  जोड़ी जाये तो साल भर की स्कूल की कुल  कमाई 120000000 (बारह करोड़ रुपए) होती है. इसके अलावा जन कल्याण का चोला ओढ़कर चंदा भी वसूला जाता है और सरकार द्वारा भी इन्हे कई तरह के लाभ दिए जाते हैं.

आँखों देखी – क्या स्कूल सच में नुकसान उठा रहे हैं ?

लेकिन यहाँ हम सिर्फ टयूशन फीस की ही बात करेंगे.

क्या इस स्कूल को चलाने में एक करोड़ रुपए महीने का खर्च आता है ?

क्या स्कूल ने इस महामारी के समय में शिक्षकों और अपने कर्मचारियों को पूरा बेतन दिया है ?

क्या स्कूल ने अपने कर्मचारियों की छटनी नहीं की है ?

क्या ऑनलाइन क्लास से स्कूलों के खर्च कम नहीं हुए हैं?

इन सबके बावजूद भी आज स्कूल फंड्स का रोना रो रहे हैं, तो फिर कोरोना की मार झेलने वाले उस आम आदमी का क्या हाल होगा जिसे ब्लैकमेल करके ये और ज्यादा पैसा बटोरना चाहते है.  

आज ज्यादातर स्कूल इसी तरह से अभिभावकों प्रताड़ित कर रहे हैं को आखिर में बात उन चार लोगों की, ऐसे चार लोग आपको हर जगह मिल जायेंगे जो अपने जरा से फायदे के लिए गलत के साथ खड़े हो जाते है और दूसरे लोगों के लिए मुसीबत का कारण बनते हैं.

संपर्क – thechanakya24@gmail.com